जानें क्यों होता है हवन करने से वातावरण शुद्ध व पवित्र

जानें क्यों होता है हवन करने से वातावरण शुद्ध व पवित्र



हवन या यज्ञ करना भारत की अर्वाचीन परम्पराओं में शामिल है। सनातन मतावलंबियों के लिए तो हवन में डाली गई सामग्री जिसे हविश भी कहा जाता है, देवताओं को लगाए जाने वाले भोग के समान है।
सनातन काल से ही हवन को धर्म संस्कृति के अतिरिक्त स्वास्थ्य और वातावरण के लिए शुभ माना गया है।


हवन से न केवल वातावरण में उपस्थित कीट पतंगों का नाश होता है, अपितु वातावरण में उपस्थित नकारात्मक ऊर्जा का भी नाश होता है। इसलिए हवन को सुख-समृद्धि का दाता भी माना गया है।
भारत के रीति-रिवाजों को लेकर अक्सर तरह-तरह की बातें होती रही हैं। कभी आलोचनात्मक तो कभी इनमें छुपे  रहस्यों को जानने की जिज्ञासाओं को लेकर।


 फ़्रांस के ट्रेले नामक वैज्ञानिक ने हवन पर रिसर्च किया। जिसमें उन्हें पता चला की हवन मुख्यत आम की लकड़ी पर किया जाता है। जब आम की लकड़ी जलती है तो फ़ॉर्मिक एल्डिहाइड नामक गैस उत्पन्न होती है। जो कि खतरनाक बैक्टीरिया और जीवाणुओं को मारती है तथा वातावरण को शुद्द करती है। इस रिसर्च के बाद ही वैज्ञानिकों को इस गैस और इसे बनाने का तरीका पता चला।


टौटीक नामक वैज्ञानिक ने हवन पर की गयी अपनी रिसर्च में ये पाया की यदि आधे घंटे हवन में बैठा जाये अथवा हवन के धुएं से शरीर का सम्पर्क हो तो टाइफाइड जैसे खतरनाक रोग फ़ैलाने वाले जीवाणु भी मर जाते हैं और शरीर शुद्ध हो जाता है।


हवन की महत्ता देखते हुए राष्ट्रीय वनस्पति अनुसन्धान संस्थान लखनऊ के वैज्ञानिकों ने भी इस पर एक रिसर्च की । क्या वाकई हवन से वातावरण शुद्द होता है और जीवाणु नाश होता है ?अथवा नही ? उन्होंने ग्रंथों में वर्णिंत हवन सामग्री जुटाई और जलाने पर पाया कि ये विषाणु नष्ट करती है। फिर उन्होंने विभिन्न प्रकार के धुएं पर भी काम किया और देखा कि सिर्फ आम की लकड़ी १ किलो जलाने से हवा में मौजूद विषाणु बहुत कम नहीं हुए पर जैसे ही उसके ऊपर हवन सामग्री डाल कर जलाया गया तो एक घंटे के भीतर ही कक्ष में मौजूद बैक्टीरिया का स्तर ९४ % कम हो गया। 


यही नहीं  उन्होंने आगे भी कक्ष की हवा में मौजुद जीवाणुओं का परीक्षण किया और पाया कि कक्ष के दरवाज़े खोले जाने और सारा धुआं निकल जाने के २४ घंटे बाद भी जीवाणुओं का स्तर सामान्य से ९६ प्रतिशत कम था। 


बार-बार परीक्षण करने पर ज्ञात हुआ कि इस एक बार के धुएं का असर एक माह तक रहा और उस कक्ष की वायु में विषाणु स्तर 30 दिन बाद भी सामान्य से बहुत कम था।
यह रिपोर्ट एथ्नोफार्माकोलोजी के शोध पत्र (resarch journal of Ethnopharmacology 2007) में भी दिसंबर २००७ में छप चुकी है। रिपोर्ट में लिखा गया कि हवन के द्वारा न सिर्फ मनुष्य बल्कि वनस्पतियों एवं फसलों को नुकसान पहुचाने वाले बैक्टीरिया का भी नाश होता है। जिससे फसलों में रासायनिक खाद का प्रयोग कम हो सकता है। इतना ही नहीं वनस्पतियों के पास हवन की धूनी रखने मात्र से उनके विकास में आश्चर्यजनक परिणाम देखने को मिलते हैं।


धार्मिक मान्यताओं से इतर सभी मनुष्यों को अपने स्वास्थ्य और वातावरण की शुद्धि के लिए हवन प्रक्रिया को अपनाया जाना विश्व कल्याण के लिए हितकर होगा।


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