जीवन दर्शन की एक संपूर्ण पाठशाला थे गांधीजी

गांधीजी की 150वीं जयंती पर  विशेष:
जीवन दर्शन की एक संपूर्ण पाठशाला थे गांधीजी



आमतौर से मोहनदास करमचंद गांधी जिन्हें महात्मा गांधी और राष्ट्रपिता के रुप में और एक ऐसे नेता के रूप में जाना जाता है जिन्होंने देश के लिए नाना प्रकार के बलिदान देने के साथ-साथ और आजाद भारत की नींव रखी।


गांधी जी वास्तव में जीवन पर्यंत और उसके उपरांत भी एक आदर्श सचल पुस्तकालय और जीवन दर्शन शास्त्र के समान रहे हैं। गांधी जी के जीवन मूल्य आज भी जनजीवन को प्रेरणा देते हैं और युग युगांतर तक उनकी यह भूमिका जारी रहेगी। गांधीजी के यही  गुण  उन्हें दिव्य बनाते हैं जिसके लिए उन्हें महात्मा  कहा जाता है।


गांधीजी ने न केवल सत्य और अहिंसा का मार्ग देशवासियों को दिखलाया बल्कि उन्होंने दूरदर्शिता, स्वाबलंबन, अध्यात्म, दृढ़ प्रतिज्ञ होना व अनेकानेक अन्य आदर्श भी प्रस्तुत किए जो आज भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने गांधी जी के जीवन काल में थे।


आमतौर पर कहा जाता है "जैसी करनी वैसी भरनी", परंतु गांधी जी ने इस किंवदंती को परिवर्तित करते हुए दुनिया को बताया कि यदि व्यक्ति की 'कथनी' और 'करनी' में अंतर न हो तो वह अपने लक्ष्यों को सहजता से प्राप्त कर सकता है और समाज में उसका एक विशिष्ट स्थान बन सकता है। गांधी जी स्वयं भी किसी बात को कहने से पहले उसे अपने जीवन में चरितार्थ करते थे। जिसका एक प्रमुख उदाहरण उनकी अपनी जीवनचर्या से मिलता है। जब उन्होंने एक मां के कहने पर उसके बालक को गुड़ खाने से मना करने के लिए एक माह बाद आने को कहा। जब 1 माह बाद वह मां अपने बालक के साथ गांधीजी के पास आई तब कहीं गांधीजी जी ने उस बालक को अधिक गुड़ खाने से  होने वाली  बीमारियों व अन्य बुराइयों के बारे में बताते हुए बालक को गुड़ खाने से मना किया। बालक जब गांधी जी से प्रभावित होकर उनकी बात मान गया तब बालक की माँ ने गांधीजी से एक माह बाद बुलाने का कारण पूछा तो गांधी जी ने सहज ही उत्तर दिया कि पहले जब तुम बालक को लेकर आई थी तब मैं स्वयं भी गुड़ खाता था। इसलिए मैं बालक को गुड़ खाने से रोकने के लिए कहने का नैतिक अधिकार नहीं रखता था। इस प्रकार यह घटना गांधीजी की कथनी और करनी एक समान होना चरितार्थ करती है और यह बताती है कि यदि व्यक्ति अपने संयम और नियम से अपनी करनी और कथनी को एक समान रखे तो वह समाज में अन्य व्यक्तियों पर प्रभाव डाल सकता है।


गांधीजी में नेतृत्व की विलक्षण क्षमता थी उनके भाषण विचार और कार्य के बीच में कभी विरोधाभास नहीं होता था जिस कारण गांधीजी को सर्वमान्य नेता माना जाता था। तत्कालीन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के किसी भी नेता ने कभी उनके कहने को नहीं टाला और न ही उसके विपरीत कोई कार्य किया। इससे भी गांधी जी की 'कथनी-करनी' और नेतृत्व क्षमता की पुष्टि होती है।



गांधी जी का समय प्रबंधन भी अद्भुत था निरंतर व्यस्त रहने के बाद भी उन्होंने कभी आश्रम में श्रमदान, हजारों पत्रों का जवाब, पूजा से टहलने जाने तक का भी समय नियमित रूप से निकाला जो उन्हें आम जनमानस से पृथक करता है और आत्म अनुशासन की महत्ता को दर्शाता है।


गांधीजी का जनसंपर्क भी विलक्षण था जिसके परिणाम स्वरूप दांडी मार्च जैसा बेमिसाल उदाहरण देश और दुनिया को देखने को मिला। अनंत विरोध और विद्रोहियों के बावजूद उन्होंने अपने अनुयायियों के साथ मार्च शुरू किया शुरू किया तो वह निरंतर चलते गए और उनका कारवां बढ़ता चला गया। उनके साथ कौन है कौन नहीं, यह देखे बिना ही गांधीजी आगे बढ़ते चले गए, आगे बढ़ते चले गए और उनके अनुयाई उनके साथ जुड़ते चले गए।


गांधी जी अपने आप में एक बड़ी नामचीन ब्रांड के रूप में दुनिया के सामने उभर कर आए उन्होंने स्वदेशी आंदोलन, विदेशी कपड़े जलाने तक सीमित नहीं रखा यह अर्थव्यवस्था को फिर खड़ा करने का सफल प्रयोग था। उनकी दिशा निर्देशित खादी एक सफल ब्रांड है जो आज भी उनके नाम से ही प्रचलित है। इतना ही नहीं गांधीजी की ग्रामीण विकास के संबंध में बेमिसाल सोच थी। उनका मानना था कि गांव किसी भी देश या समाज की आधारशिला होती हैं। इसलिए गांव को वे एक स्वतंत्र इकाई मानते थे और वहीं से विकास कार्यों के शुरू किए जाने को प्रमुखता देते थे।


गांधीजी के आंदोलनों की सबसे बड़ी ताकत उनकी नैतिक ताकत थी वह जानते थे कि अंग्रेज शक्तिशाली है पर नैतिक मूल्यों में कमजोर हैं। उनके असहयोग आंदोलन के आगे अंग्रेज भी बोने साबित हुए इस आंदोलन में गांधीजी ने दिखा दिया कि निहत्थे लोग भी असरदार व ताकतवर शक्तियों को हिला सकते हैं।


गांधीजी पूंजीवाद और साम्यवाद के बीच समन्वय स्थापित करके समावेशी विचारधारा के एक प्रबल समर्थक थे। उनका मानना था की अमीर संसाधनों के नियंत्रक नहीं हैं बल्कि संरक्षण हैं ताकि संसाधनों का दुरुपयोग ना हो सके और गरीबों का हक ने मारा जाए। उनका कहना था कि प्राकृतिक संसाधनों पर गरीबों और अमीरों का समान अधिकार है।


पारदर्शिता और सकारात्मक सोच जैसे गांधीजी की सहचरी थी। उन्होंने न केवल सादे जीवन का उपदेश जनमानस को दिया बल्कि उसे स्वयं अपने जीवन में भी उतारा। अपनी कमजोरियों को सार्वजनिक करने में वे तनिक भी हिचकिचाते नहीं करते थे। विषमकाल में वही उनकी एक बड़ी ताकत के रूप में बन जाता था। बापू जानते थे कि भरोसा बढ़ाने के लिए शुचिता और पारदर्शिता जरूरी है। बापू के अंदर सकारात्मक सोच के गुण कूट-कूट कर भरे हुए थे गुस्से में भी वे नकारात्मक भावनाएं जताने के बजाय शांतिपूर्ण विरोध में भरोसा करते थे।


गांधीजी की जिंदगी में कई ऐसे पल आए जिन्होंने गांधी जी की संपूर्ण जीवन शैली को परिवर्तित करके रख दिया भले ही ऐसे पल उनके बचपन के दौरान  पिता के हाथों दंडित होने  के हों अथवा उनकी शिक्षा के दौरान जब भी वकालत पढ़ने या वकालत करने के दौरान आए तब के हों या जब वे स्वदेश वापसी के बाद भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े तब के हों  या फिर स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उनके द्वारा  संचालित अनेकों अभियान के दौरान रहे हों।


7 जून 1893 को दादा अब्दुल्ला एंड संस के केस के सिलसिले में महात्मा गांधी को डरबन से प्रिटोरिया जाना था उनके पास ट्रेन का प्रथम श्रेणी का टिकट होते हुए भी अश्वेत होने के कारण उन्हें तीसरी श्रेणी के डिब्बे में जाने को कहा गया। जिससे गांधी जी ने इंकार किया तो पीटर मेरिट स्वर्ग स्वर्ग मेरिट स्वर्ग स्वर्ग मेरिट स्वर्ग ने इनकार किया तो पीटर्सबर्ग स्टेशन पर उन्हें जबरन ट्रेन से नीचे उतार दिया गया यह घटना गांधीजी के जीवन को अत्यधिक प्रभावित करने वाली घटना रही। उनके जीवन को एक नया मोड़ इस घटना ने दिया। गांधीजी कड़कड़ाती ठंड में पूरी रात स्टेशन के प्रतीक्षालय में बैठे रहे और यह विचार करते रहे कि क्या उन्हें स्वदेश लौट जाना चाहिए या फिर जुल्म के खिलाफ संघर्ष करना चाहिए 1894 में गांधी जी ने भारतीय नेशनल कांग्रेस की स्थापना की जिसका मकसद अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों का शांतिपूर्ण विरोध करना था। डरबन के पास फीनिक्स फार्म की स्थापना की जो दुनिया भर में सत्याग्रह की जननी में रूप में मशहूर हुआ।


'जैसे को तैसा' की विचारधारा से दूर गांधी जी के नेतृत्व में एक बड़ा गुण माफ कर देना था। उनका मानना था कि क्षमा करना और उस स्मृति को यादों की जकड़न से निकाल देना स्वयं के लिए ही सुकून की बात होती है। उनका यह भी मानना था कि दूसरे को उपदेश देने के स्थान पर, कही जाने वाली बातों को पहले अपने जीवन में ढालना महत्वपूर्ण है।


गांधीजी भविष्य के स्थान पर पर वर्तमान को महत्व देते थे। खुद पर भरोसा और निरंतर प्रयत्नशील रहना उनका एक अहम दर्शन था। गांधीजी दूसरों के अवगुणों पर चिंतन करने की जगह अपने गुणों को विकसित करने की बात कहते थे। वे जानते थे कि कोई भी व्यक्ति निर्गुण नहीं है जिस का सदुपयोग होना चाहिए।


निर्बल सी काया और सामान्य कद काठी वाले इस व्यक्ति ने दुनिया को दिखा दिया कि शारीरिक हृष्टपुष्टता, नेतृत्व का पैमाना नहीं हो सकता। इसके लिए नेतृत्व के विभिन्न गुणों का समावेश होना आवश्यक है।


गांधी जी को दार्शनिकों, साहित्यकारों व अन्य आलोचनाकारों ने जितना भी पढ़ा है,  उतना ही उन्हें गांधी जी के दर्शन व चरित्र में बार-बार नवीनता का बोध हुआ हुआ है। इसलिए भी कहा जा सकता है कि गांधीजी स्वयं में जीवन दर्शन की एक संपूर्ण पाठशाला थे और उनकी पाठशाला के व पन्ने  आज भी समाज को दिशा देते हैं मार्गदर्शन करते हैं।